शुंग वंश ( ई.पू. 187 से ई.पू. 75 तक )
शुंग कालीन इतिहास के स्त्रोत :-
साहित्यिक स्त्रोत :- पुराण (मत्स्य , वायु , ब्रम्हांड), महाभाष्य (पतंजलि), गार्गी संहिता , मालविकाग्निमित्रम (कालिदास)
हर्षचरित (बाणभट्ट) , थेरावली (मरूतुंग) हरिवंश , दिव्यावदान
अभिलेखीय स्त्रोत : धनदेव का अयोध्या अभिलेख , बेसनगर का स्तम्भ , भरहुत लेख , हाथी गुम्फा अभिलेख।
मतभिन्नता - शुंगों की उत्पत्ति पर
मतैक्यता नहीं है। जैसे हरप्रसाद शास्त्री इन्हें ईरानी मानता है। दिव्यावदान शुंग
को मौर्य वंशज कहता है। मालविकाग्निमित्रम से शुंग बैम्बिक वंश के कश्यप गोत्रीय
ब्राम्हण थे। बौद्धायन श्रोत सूत्र इसका समर्थन करता है। परन्तु अष्टाध्यायी (
पाणिनी ) इनका गोत्र भरद्वाज बताता है। लामा तारानाथ ने इनका समर्थन किया है। अतः
भारतीय साहित्य के अनुसार शुंगों को ब्राम्हण ही माना जाता है। आश्वलायन श्रोत में
शुंगों को आचार्य कहा है तथा हर्षचरित अनार्य व निम्नकुल मानता है।
पुष्यमित्र शुंग (ई0पू0 187 से ई0पू0 149)
पुष्यमित्र अंतिम मौर्य शासक वृहदथ का सेनापति था।
संभवतः पूर्व में यह अवंति का राज्यपाल भी रहा। 190 ई0पू0 के लगभग इण्डो-ग्रीक शासक के
पुत्र एण्टिओक का दामाद डेमेट्रियस ने भारत पर हमला करके उत्तर पश्चिम का भाग छीन
लिया। और आंध्रों के असफल विद्रोह ने मौर्य शक्ति की प्रतिष्ठा को धूमिल किया। अतः
प्रजा के मौन समर्थन से प्रेरित होकर पुष्यमित्र शासक तो बन गया किन्तु वह अब भी
सेनापति ही स्वयं को कहता ( ई0पू0
187
से ई0पू0
184)।
महत्वपूर्ण घटनाएं :
विदर्भ युद्ध : ‘ मालविकाग्निमित्रम ’ नाटक
में उल्लेख है कि विदर्भ के मौर्य प्रांतपति यज्ञसेन ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित
कर पुष्यमित्र के समर्थक माधवसेन को कैद कर लिया। अतः विदिशा के प्रांतपति
अग्निमित्र ( पुष्यमित्र का पुत्र ) को विदर्भ भेजा तथा विदर्भ का विभाजन कर
शुंगराज के अधीन एक भाग यज्ञसेन तथा दूसरा भाग माधवसेन को दिया।
यवनों से संघर्ष : इसके समय की महत्वपूर्ण घटना
यवनों से संघर्ष थी। डेमेट्रियस के नेतृत्व में हुए आक्रमण के विरूद्ध सिंधुतट पर
युद्ध में पुष्यमित्र ने इन्हें परास्त किया तथा मध्यप्रदेष से यवनों को दूर रखा।
गार्गी संहिता के अनुसार यवनों ने माध्यमिका चित्तौड़) पर हमला किया। यवन साकेत , मथुरा तथा पांचाल तक आ गए।
यवनों से विजयोपलक्ष्य में पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध
यज्ञ किए।
अश्वमेध यज्ञ : अपनी प्रथम विजय के उपरांत
उसने प्रथम अश्वमेध यज्ञ किया संभवतया यवनों ने इस घोड़े को पकड़ लिया , जिसमें यवन पराजित हुए। अतः
दूसरा अश्वमेध यज्ञ भी कर डाला। इनमें से एक यज्ञ में पुरोहित का कार्य संरक्षित
विद्वान पतंजलि ने किया था। दो अश्वमेध यज्ञों का ज्ञान धनदेव के अयोध्या अभिलेख
तथा एक का ज्ञान पतंजलि के महाभाष्य से होता है।
राजधानी : इस समय तक ‘‘ पाटलिपुत्र ’’
ही राजधानी रही। अयोध्या लेख के अनुसार कौशल पर इसका प्रभुत्व बताता है। ‘‘
आर्यमंजुश्री मूल कल्प ’’ तथा ‘‘ दिव्यावदान ’’ में इसे बौद्ध धर्म संहारक कहा गया
है।
पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी :-
अग्निमित्र ( ई0पू0 149 से ई0पू0 141 )
: यह पिता के
शासन काल में नर्मदा प्रदेश का शासक था। जिसकी राजधानी विदिशा थी। राजा बनने के
बाद इसने साम्राज्य विस्तार वर्धा नदी तक किया। राज्य की दूसरी राजधानी विदिशा को
इसने प्राथमिकता प्रदान की। अतः इस समय तक विदिशा ने पाटलिपुत्र का स्थान ले लिया।
कालिदास ने अपने नाटक ‘मालविकाग्निमित्रम’ में इसी अग्निमित्र का अपनी दासी
मालविका से प्रेम कथा का वर्णन किया है। इसका सेनापति वीरसेन था।
सुज्येष्ठ या वसुज्येष्ठ शुंग ( ई0पू0 141 से
ई0पू0
131 ) :शुंग राजवंश के तीसरे राजा थे। उनका साम्राज्य क्षेत्र दस्तावेजों
से अच्छे से प्राप्त नहीं किया जा सकता अतः उनके बारे में बहुत कम ज्ञात है।
वसुमित्र ( ई0पू0 131 से ई0पू0 124 ) : पुष्यमित्र के समय यह उत्तर पश्चिम
सीमा प्रान्त का प्रांतपति था। तब डेमेट्रियस के नेतृत्व में भारत पर यवन आक्रमण
हुआ उस समय वसुमित्र ने डेमेट्रियस के सेनापति मिनेण्डर को पराजित किया था।
क्योंकि मालविकाग्निमित्रम से ज्ञात होता है कि अश्वमेध के घोड़े की रखवाली का काम
वसुमित्र (अग्निमित्र का पुत्र) ने किया था। इस घोड़े को यवनों ने पकड़ लिया जो यवन
- शुंग संघर्ष का करण बना। हर्षचरित के अनुसार बाद में विलासी हो जाने के कारण
इसके मंत्री मूजदेव या मित्रदेव ने एक नृत्योत्सव के दौरान इसकी हत्या कर दी।
वसुमित्र ने अपने राज्य की राजधानी अयोध्या बनाई। इसके हत्यारे ने अयोध्या में
स्वतंत्र राज्य की स्थापना की , जो शुंग वंश का ही था।
अन्ध्रक ( ई0पू0 124 से ई0पू0 122 ) :
पुलिन्दक ( ई0पू0 122 से ई0पू0 119 ) :
घोष ( ई0पू0 119 से ई0पू0 108 ) :
वज्रमित्र ( ई0पू0 108 से ई0पू0 94 ) :
भाग भद्र शुंग ( ई0पू0 94 से ई0पू0 83 ) : इसका उल्लेख बेसनगर स्तम्भ से
ज्ञात होता है। इसके शासन काल के चौदहवें वर्ष तक्षशिला नरेश एण्टियालकीड्स का
राजदूत हेलियोडोरस विदिशा स्थित शुंग दरबार में आया तथा भगवत धर्म ग्रहण कर भगवान
वासुदेव को समर्पित गरूणध्वज स्तम्भ का निर्माण बेसनगर ( विदिशा ) में कराया। इस
स्तम्भ पर अंतिम शुंग नरेश का नाम काशीपुत्र भाग भद्र अंकित है।
देवभूति ( ई0पू0 83 से ई0पू0 73 ) : यह अत्यंत विलासप्रिय तथा अंतिम
शुंग शासक था। इसकी हत्या इसके अमात्य वसुदेव ने लगभग 73 ई0पू0 में करके ‘‘ कण्व वंश ’’ की
नींव डाली।
शुंग कालीन प्रशासनिक व्यवस्था :
एक मंत्रि परिषद थी तथा राज्य पुष्यमित्र के आठ
पुत्रों में प्रतिनिधित्व स्वरूप विभक्त कर दिया था। साम्राज्य की दो राजधानियां
थीं। 1. पाटलिपुत्र 2. विदिशा। पुष्यमित्र के उपरांत
शासकों ने राज विरूद धारण किए।
शुंग कालीन धार्मिक नीति :
पुष्यमित्र ब्राम्हण धर्म का समर्थक था किन्तु धर्म
असहिष्णु नहीं था क्यांकि भारहुत में विशाल स्तूप बनवाया तथा साँची एवं बोध गया के
स्तूपों की वेदिकाएं बनवाईं।
मथुरा के समीप ‘‘मोरा’’ नामक स्थान से प्रथम सदी ईसवी
के लेख से ज्ञात होता है कि ‘‘तोस’’ नामक विदेशी महिला ने पंच वृष्णि वीरों (
संकर्षण , वासुदेव , साम्ब , प्रद्युम्न तथा अनिद्ध ) की
मूर्ति स्थापित कर पूजा की।
स्मरणीय तथ्य :
· वैदिक धर्म की पुर्नस्थापना एवं
प्रतिष्ठा शुंग काल में स्थापित हुई।
· मनुस्मृति की रचना आरम्भ हुई।
· आठ विवाह में चार वैध तथा चार
अवैध घोषित किए गए।
· तलाक प्रथा नहीं थी। नियोग एवं
विधवा विवाह होते थे।
· अनुलोम - प्रतिलोम विवाह मान्य
थे। परन्तु प्रतिलोम विवाह निन्दनीय था।
· गोनर्द ( म0प्र0
) निवासी
पतंजलि , पुष्यमित्र को संरक्षित दरबारी
विद्वान था जिसने महाभाष्य की रचना की।
· सर्व वर्ण सेवक शूद्रों को मनु स्मृति ने शिक्षा
प्राप्त करने का अधिकार दिया। इसमें शूद्र गुरू एवं शूद्र शिष्य का उल्लेख है।
· मनु स्मृति ने आश्चर्यजनक रूप से
ब्राम्हण पुरूष को शूद्र कन्या से विवाह की अनुमति प्रदान की है।
· स्वर्ण सिक्के - निष्क , दीनार , सुवर्ण , सुवर्ण मासिक। ताम्र सिक्के -
कार्षापण तथा रजत सिक्के - धारण या पुराण कहलाए। रजत सिक्का शुंग कालीन मानक
सिक्का था।
· महाभारत के शांति पर्व तथा अश्वमेध
पर्व का परिवर्धन हुआ।
· बेसनगर , विश्वनगर का अपभ्रंश है।
जनश्रुति है कि इसकी नींव राजा रूकमंगद ने डाली थी।
· बेसनगर का स्तम्भ कनिंघम द्वारा
खोजा गया। खोज के पूर्व तक स्थानीय लोग इसे ‘‘ बाबा बैरागी का स्तम्भ ’’ कहा जाता
था।
धन्यवाद
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